इक्कीसवीं सदी के समकालीन युग में अनामिका और कात्यायिनी की हिंदी कविताओं में ग्रामीण बोध एवं लोक संस्कृति

Authors

  • Vandana Nautiyal Maya Devi University, Dehradun
  • Nidhi Upreti Maya Devi University, Dehradun

DOI:

https://doi.org/10.65890/dmp.lnmr.IMPACT26.179

Keywords:

स्त्री विमर्श, अस्तित्व, आत्मसम्मान, विद्रोहात्मक रूप, नारी सशक्तिकरण

Abstract

आधुनिक युग में स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारीवाद एवं नारी सशक्तिकरण की चर्चा चारो ओर है। वर्षो से होते आये स्त्री शोषण ने ही स्त्री विमर्श की ओर ध्यान आकर्षित किया है। विभिन्न लेखकों ने स्त्री चेतना को अपनी कविताओं का विषय बनाया परंतु जिस प्रकार नारी संवेदना को महिला लेखिकाओ ने नारी मन की भावना को उकेरना शुरू किया वह स्त्री विमर्श नारी के आत्मागौरव और सम्मान का उल्लेखनीय उदारण प्रस्तुत करता है। स्त्री, दलित, आदिवासी, वृद्ध विमर्श आज भी साहित्य के शोध केंद्र में नहीं है। विमर्श का अर्थ है किसी विषय के बारे में सोचना और विचार करना। इस दृष्टि से देखा जाए तो स्त्री विमर्श नारी से संबंधित सभी मुद्दों को सोचने समझने और विचार करने वाला चिंतन है। नौवीं शताब्दी में आते आते स्त्री विमर्श ने विद्रोहात्मक रूप धारण कर लिया और इक्कीसवी सदी तक आते आते स्त्री विमर्श साहित्य, संगोष्ठी और शोध के केंद्र में भी छा गया। आधुनिक युग में नारी विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारी वाद और नारी शशक्ति करण का शोर चारो तरफ है। इस शोध पत्र की प्रस्तुति समाज को स्त्री की स्थिति और अस्तित्व के प्रति जागरूक करना और उसकी चिंता के लिए समाज को जागरूक करना, पुरुषो के समान इंसान को समझना और उसके दुख दर्द के कारणों को समाज को समझाना है।

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Published

02-07-2026

How to Cite

Nautiyal, V., & Upreti, N. (2026). इक्कीसवीं सदी के समकालीन युग में अनामिका और कात्यायिनी की हिंदी कविताओं में ग्रामीण बोध एवं लोक संस्कृति. DMPedia Lecture Notes in Multidisciplinary Research, IMPACT26, 1441-1446. https://doi.org/10.65890/dmp.lnmr.IMPACT26.179